Sunday, November 1, 2015

Ahista chal zindagi by Gulzar


आहिस्ता चल ज़िन्दगी
कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है

कुछ दर्द मिटाना बाकी है
कुछ फर्ज़ निभाना बाकी है

रफ़्तार मे तेरे चलने से कुछ रूठ गए
कुछ छुट गए

रूठो को मनाना बाकी है
रोतो को हँसाना बाकी है

कुछ हसरते अभी अधूरी है
कुछ काम अभी और ज़रूरी है

ख्वाईशें जो घुट गयी है दिल मे
उनको दफनाना बाकी है

कुछ रिश्ते बन कर टूट गए
कुछ जुड़ते जुड़ते छुट गए

उन टूटे छूटे रिश्तों के ज़ख्मो को मिटाना बाकी है

तू आगे चल , मै आता हूँ
क्या छोड़ तुझे ज़ी पाऊँगा ?

इन साँसों पे हक़ है जिनका
उनको समझाना बाकी है

आहिस्ता चल ज़िन्दगी
कई क़र्ज़ चुकाना बाकी है

                   .......गुलज़ार

Sunday, October 18, 2015

Ay mohbat tere anjaam pe rona aaya

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यू आज तेरे नाम पे रोना आया

यूँ तो हर शाम उम्मीदों मे गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम से रोना आया

कभी तक़दीर का मातम , कभी दुनियां का गिला
मंज़िलें इश्क़ में हर ग़ाम पे रोना आया

मुझ पर ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ऐ-नौउहागिरि
इस क़दर गर्दिश-ऐ-अय्याम पे रोना आया

जब हुआ , ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शक़ील'
मुझकों अपने दिल-ऐ-नाक़ाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यू आज तेरे नाम पे रोना आया

                .................   शक़ील बदायूँनी

ग़ाम : Step

नौउहागिरि : Dirge
A dirge is a somber song or lament expressing mourning or grief, such as would be appropriate for performance at a funeral.

गर्दिश : misfortune
अय्याम : duration

https://youtu.be/ik75GgM7VV4

Wednesday, August 26, 2015

The Transit of Venus




नन्ही जिज्ञासु आँखों मे ही पायी
चाँद सितारों ने अपनी परछाई
इतनी चमक तो ख़ुद चाँद में भी नहीं थी
जितनी इन आँखों ने दर्शायी
यही है बचपन की मासूम सच्ची आँखों की कशिश
निश्छल चंचल शब्दों ने यही अपनी परिभाषा है पायी
........कपिल

"The Transit of Venus" 1883
Painting by John George Brown,
American, 1831 - 1913

Friday, August 14, 2015

Millen Barjtya photo

लकीर टपू
त्रिकोण टपू
चैकोर टपू

इक बार टपू
सौ बार टपू

पार करूँगा
जीवन की हर सरहद
यूँही मस्त मस्त कदमो से
पाउँगा सर्वशेष्ट मुकाम

परवाह नहीं चाहे कितनी ही लम्बी हो यह डगर ,
कामना है सिर्फ यही , बने रहने हमेशा मेरे साथ यु ही

.............. मिलन बड़जात्या

Monday, August 10, 2015

Vedika Facebook Post Kapil's Kavita





छुक छुक करती आगे बढ़ती
पर्वत जंगल नदी पहाड़
सबको पार करती
समुंदर तट पर लेकर जाती

छुक छुक करती आगे बढ़ती
मे मम्मी नानी को साथ लिए
शनिवार को घूमने निकली
कितने मजे का दिन है यह

छुक छुक करती आगे बढ़ती
सपनो का संसार रचाती
इक दिन चाँद सूरज तक जाउंगी
सात समुन्दर पार हो आऊँगी
महाद्वीप प्रायद्वीप खाड़ी दर्रे
उत्तरी ध्रुवः दक्षिणी ध्रुवः
एवरेस्ट तक हो आउंगी
अपने सारे दोस्त भी लेकर जाउंगी

छुक छुक करती आगे बढ़ती

Tuesday, August 4, 2015

Ay mohbat tere anjaam

ऐ मोहब्बत, तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ, आज तेरे नाम पे रोना आया

यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम से रोना आया

कभी तक़दीर का मातम , कभी दुनिया का गिला
मंज़िले इश्क़ में, हर ग़ाम पे रोना आया

मुजहे पर ही ख़तम हुआ सिलसिला-ऐ-नौउहागिरि
इस क़दर गर्दिश-ऐ-अय्याम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का "शक़ील"
मुझको अपने दिल-ऐ-नाकाम पे रोना आया

               ............................. शक़ील बदायूँनी

ग़ाम : step, footstep, pace of a horse
नौउहागिरि : mourning
अय्याम : fortune

Tuesday, June 16, 2015

Kapil Jain : Story : Lost Priorities



Kapil Jain : Story : Lost Priorities

बात जो कहने जा रहा हूँ , अगर बुरी लगे तो माफ़ी देना , पर कह रहा हूँ पूरे होशों हवास मे |

इसे एक चुभती हुई बात कहिये या अपनी गलती या पता नहीं क्या है यह , हुआ यूं की करीब दस साल पहले , हम करोल बाग़ दिल्ली से नोएडा शिफ्ट हुऐ थे |

अभी घर मे काफी फर्नीचर इत्यादि बनना बाकि था , करीब चार पांच दिन ही हुऐ थे , पूरे घर मे कोई भी कमरा पूरी तरह व्यवस्थित नहीं था , कुछ सामान पुराने घर से नहीं आया था , क्योंकि अभी तक ऑफिस पुराने घर के पास था अतः प्रतिदिन थोडा थोडा सामान आ जाता था और अपनी नयी जगह सेट हो जाता था |

एक शाम , सामान मे कुछ पुराने दस्तावेज़ की फ़ाइले मेरी माँ की अलमारी से आये , जो कुछ बहुत खानदानी विरासत लिए हुए लगते थे अतः मैने अपनी माँ के कमरे में उन्हें बताते हुऐ कहा , आप इन्हें देख लेना , माँ लेटी हुई आराम कर रही थी , बोली की बहुत थक गयी हूँ कल देखूँगी |

अगली रात देर हुई जब मे घर वापस आया तो बहुत ही थक गया था , माँ बहुत ही देर से मेरा इंतज़ार कर रही थी , उन्होंने मुझे एक फ़ोटो देते हुए कहा , की यह आपकेे पड़बाबा जी की एक मात्र फ़ोटो है , इसे बहुत संभाल के रखना , मैने पहली बार अपने पड़बाबा जी की फ़ोटो देखी थी , मुझे बहुत ही ख़ुशी हुई , अभी तक मेरा अपना कमरा और अलमारियां भी सेट नहीं हुई थी , मैने बहुत ही ध्यान से फ़ोटो अपनी एक किताब के अंदर रख दी |

कुछ हुआ यूं कि अगले दिन ही मुझे कही दूसरे शहर एक हफ्ते के लिये जाना पड़ा | जब वापस आया तो पाया , घर काफी कुछ व्यवस्थित था , बहुत ही अच्छा लग रहा था | क़रीब दस पंद्रह दिन हुए , नाश्ते पर माँ ने मुझसे कहा की पड़बाबा जी की फ़ोटो को फ्रेम करवा देना , सुनते ही मेरा माथा ठनक गया , मेरी सारी किताबे उस जगह से हट कर स्टडी की अलमारीयो मे सेट हो चुकी थी , मुझे यह भी याद नहीं था की मैने किस किताब मे फ़ोटो रखी थी | माँ ने सिर्फ़ मेरी शक़्ल से ही सारी बात समझ ली , कुछ नहीं कहा | 

मैं ऑफिस चला गया , ऑफिस मे भी आधा दिमाग़ फ़ोटो में ही रहा , शाम देर से ही घर वापस पंहुचा , डिनर करते ही , एक एक करते छः दर्ज़न किताबो का पन्ना पन्ना छान मारा आधी रात हो गयी , फ़ोटो का कोई अता पता नहीं | सुबह नाश्ते पर माँ ने सिर्फ़ शक्ल देखी कुछ नहीं बोली | अगले दिन संडे था , दुनिया जहान का काम छोड़ कर मैने सारी किताबे फिर पलट दी , भगवान जाने फ़ोटो कहा गयी | मै बहुत परेशान हो गया | माँ सारी बात समझते हुए भी चुप थी | 

महीने दो महीने निकल गए | मै भी अब यह बात लगभग भूल गया | फिर एक दिन ना जाने कैसे घर की फर्नीचर की बात करते करते फ़ोटो का ज़िक्र आ गया | मैने माँ से कहाँ की माँ मुझसे बहुत गलती हो गयी पड़बाबा जी की फ़ोटो मुझसे गुम हो गयी , बोली की मुझे पता था की वोह फ़ोटो गुम गयी हैं , जो हुआ शायद यही नियति थी , आख़िर तीन पीढ़ी का संभाल रखना वैसे भी बहुत मुश्क़िल है और वैसे भी यह सब प्राथमिकता की बात है |

माँ का "प्राथमिकता" वाला आख़री वाक्य कही दिल को लग गयी, इस वाकिय के करीब आठ साल बाद माँ का देहांत हो गया और अब दो साल और गुजरे की अचानक फ़ोटो मिली किसी किताब से....

वैसे राजमहलों के अलावा कही देखी है तीन पीढी की फ़ोटो ? सही है , बात तो प्राथमिकता की है.....

Story : Lost Priorities
By Kapil Jain,
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Noida , Jun 15, 2015