Saturday, June 6, 2020

waqt ki har shay ghulam

*Waqt ki har Sheh Ghulam*, 
*वक़्त की हर शह गुलाम*: *कुछ हकीकत कुछ अफ़साना : Short Story by Kapil Jain.*

With the intention to purchase a leisure chair, we (My wife Kamini & I ) went to Kirti nagar furniture market on our way back from a party. 

Unauthorised car parking is always an issue in such markets, however I was able to find an empty slot & tried to park & leave before any one could object. 

As I left the car I was awestruck by the shop's name, ” वक़्त की हर शह ग़ुलाम ” and the owner's name, “OMPRAKASH BAGGA“, written above it. (See attached photograph). 

For a moment, my mind and body were moved by this unique caption & after recomposing myself I took a photograph of the signboard. After two or three shots I saw the shopkeeper silently watching us.

Our eyes met & I waved a salute to the shopkeeper. I walked towards him as if a force was pulling me, the distance between us, merely fifteen twenty meters. 

He uttered the first words to us "Would you like to have tea?". I saw that he was holding a cup of tea & to my surprise to myself, I said "Yes" (it was the first ever sight, first ever word exchange). 

He asked an employee to arrange tea for us. As I had already read on the board, "OMPRAKASH BAGGA", I assumed that he is Mr. BAGGA. 

I asked my awestruck query straight away "Bagga Sahib, वक़्त की हर शह गुलाम , on shop's signboard?, I found it to be very strange".

He said nothing but his eyes spoke clearly, The Eyes said that he wanted to be reminded of this gospel truth on a daily basis. 

He served tea very affectionately & the next five minutes were spent in deafening silence though everyone around us including salesman, servants & mangers were going about their jobs in full hustle & bustle. It was certainty a cash-rich shop & the owner Mr. Bagga was sitting still, watching us sip tea & we were sipping tea in his mystical surrounding. 

Very courageously I asked him again about the signboard & after taking a deep breath he replied this.. 

जाने क्या ढूँढती रहती है ये आँखे मुझमें 
राख के ढेर में शोला है ना चिंगारी है

I got goosebumps when I heard his reply & didn't have any courage to ask further. 

Leisure Chair is still a dream. 
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सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह 
देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में
                            .... शकेब जलाली

Think if, about complete soul which is in creases all over, Though apparently looks as neatly & sharply dressed. 
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Photograph by Kapil with Kamini 
Kirti Nagar Delhi, Dec 2012

Story by Kapil Jain with Kamini Jain 
Noida, Jun 6th, 2020
All rights reserved

Tuesday, May 19, 2020

उल्लू का पट्ठा : एक हीन हकीकत : Short Story By Kapil Jain



उल्लू का पट्ठा : एक हीन हकीकत : Short Story By Kapil Jain

हीन भावना , मानस से जाने कैसे कैसे नई ईजाद कराती हैं , जैसे जुमला 'उल्लू का पट्ठा' ..

गौरवमयी पक्षी उल्लू मैने सिर्फ पाँच छः बार आमने सामने देखा है ,  इस स्टोरी के साथ सारी फ़ोटोज मैंने ही खींची थीं ।

उल्लू की नज़र से नज़र मिलते ही , दिल के अंदर एक सच्चाई तो पूरी तरह उतर जाती हैं की यह पक्षी, मानव से कई गुणों में उच्च पदवी लिये हैं ।

बड़ी बड़ी आँखों में स्थिर पुतली लिये एक आत्मविश्वासी चेहरा , 270 डिग्री यानी तीन दिशाओं में घुमाने की काबलियत लिये , नामुमकिन शांत उड़ान , अपनी गुमनामी में मस्त ।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक पेड़ के ऊपर एक घोसलें में एक बड़े उल्लू को देखते के लिये जमा फोटोग्राफी के शौकीनों की टोली में एक बेइंतहा खूबसूरत हसीन लड़की ने जब कहा , ’कितना हैंडसम हैं ’ वो भी उस उल्लू के लिऐ ।

शाम होटल के बाथरूम में मैंने खुद की शक़्ल आईने में देख कर सोचा ? कपिल कभी तुझको कभी किसी ने इतनी हसरत भरी निगाहों से हैंडसम कहा है , शायद नही , भीतर से एक कमतरी का अहसास कैफ़ियत पर तारी हो गया । 

बस यही वो बुनियाद हैं जिससे कभी इतिहास मे ’उल्लू के पट्ठे’ जुमले का जन्म हुआ होगा , शायद हीन आदमी स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति...

Short Story By Kapil Jain
Noida, April 2020 
All rights reserved. 

Tuesday, April 7, 2020

जलेबी : Short Story by Kapil Jain


जलेबी : Short Story by Kapil Jain

बात करीब पच्चीस तीस साल पहले की रही होगी, करोल बाग़ में हमारे पुराने घर के सामने नुक्कड़ पर रोज़ शाम, किशनलाल जी हलवाई और उनके लड़के गर्मागर्म जलेबी बनाते थे ।

रोज नही, कभी कभी, हवा के रुख से बह कर गर्म जलेबी की ख़मीर से भरी मादक खुशबू, हमारे झज्जे को भी महका जाती थी, उसी समय घर का कोई न कोई सदस्य जलेबी की फरमाइश करता, मैं उस तरफ लपकता, जलेबी लाता और सारा घर मजे करता ।

आप याद करिये, जब जलेबी चपटी कड़ाई में गर्म तेल में तल कर, ख़ौलती गर्म चाशनी की कड़ाई में डुपकी लगाती हैं, और चाशनी का जलेबी के रोम रोम में समा जाना, उसके बाद तर जलेबी का छन्नी के ऊपर से सराबोर चाशनी का वापस टपकना, हमेशा से मेरे लिये यह दृश्य, अपने आप मे दो प्रेमियों की चरम गाथा सी हैं, जो दोनों एक दूसरे को तृप्त किये जा रहे हो । 

Lockdown अप्रैल 2020 , उन दिनों सारा हिन्दुस्तान, Corona Virus को लेकर इक्कीस दिन के लिये अपने अपने घरों की चारदीवारी में बंद था, उससे पिछले भी कुछ दिन बहुत ही चिंता भरे थे, कारोबार रुपये पैसे ख़र्चे इत्यादि को लेकर कुछ शुरुआती दिनों की चिंता, फ़िर दिल दिमाग ने अपने आप को आगे के लिये तैयार कर लिया था, जो होगा देखा जायेगा, सब के साथ हैं, सिर्फ़ हमारे साथ हो ऐसा तो नही, यही सोच कर सब सब्र कर रहे थे, यानी दिल दिमाग कुछ हल्के हुऐ थे ।

एक शाम मौसम बहुत ही सुहाना था, हल्की हल्की बारिश से फज़ा में एक रवानगी सी आ गयी थी, बाहर आंगन में बैठे, जाने क्यूँ जलेबी की याद आ गईं , वैसे घर में रहते सब अपनी बुनियादी जरूरतों को ही पूरी कर पा रहे थे, रोटी सब्जी दाल चावल चाय इत्यादि, घर पर इस समय जलेबी का कोई जुगाड़ नही हो सकता था, घर के बाहर एक लक्ष्मणरेखा, वजह lockdown अतः बाजार इत्यादि सब बंद थे । 

जलेबी की याद का इस समय क्या मतलब ?, दिमाग ने दिल से पूछा, क्या मतलब का क्या मतलब ?, याद तो कभी भी किसी की भी आ सकती है, अगर दिल भी दिमाग की तरह दो और दो चार सोचने लगे तो घटती बढ़ती धड़कन का काम कौन करेगा ?, चंट दिल ने उलट जवाब दिया । 

दिल तुम ही समझो, तुम्हारी यह बेवक़्त की ख्वाहिश ही सारे दुखों की जड़ हैं, दिमाग ने समझाने की बेकार कोशिश की ।

जो चीज़ जिस वक़्त ना मिल सके और उसकी बेहद याद आये, उस याद में सब्र और बेचैनी की कौन सी हद मुकर्रर हो ? , कौन से जरूरत कब जरूरी कब फ़िज़ूल , और सही समय आने पर उस याद से उपजी तमन्ना को पाने की मेहनत यानी निमित कर्म I

शायद दिल और दिमाग की यही कश्मकश, स्वाध्याय को प्रेरित करती पहली सीढ़ी तो नही जिसमें खुशी, दुख, प्रेम, वासना , विरक्ति, इत्यादि भावों का सही अर्थ, व्याख्या, अभिव्यक्ति, आचरण, का ज्ञान प्राप्त हो,

शायद हाँ ....

जलेबी : Short Story by Kapil Jain
Noida, April 2020 
Kapilrishabh@gmail.com
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Wednesday, March 18, 2020

इत्र की बूँद : Drop of Attar : Story by Kapil Jain 15.03.2020

Happy Birthday Daddy
My Daddy Late Shri Karam Vir Jain
Born : March 15th, 1927
Eternity : July 29th, 1990

आज डैडी के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उनकी यादों में,
कुछ हकीकत , कुछ अफ़साना

इत्र की बूँद : Drop of Attar : Story by Kapil Jain

दिल्ली के लाल किले के सामने ऐतिहासिक बाज़ार चाँदनी चौक की शुरुआत जैन मंदिर जो लाल मंदिर के नाम से विख्यात हैं से होती है , मेरे डैडी सप्ताह में एक बार दर्शन को ज़रूर जाते थे , जब हो सके तो हम बच्चें भी साथ जाते थे ।
एक बार हम मंदिर में देव दर्शन के बाद चांदनी चौक के भीड़ भरे बाज़ार से गुजर कर दरीबा कलां के सोने चाँदी के आभूषण के मुगल कालीन बाज़ार में किसी व्यक्ति से मिलने के लिये जा रहे थे ।

दरीबा कलां बाज़ार में खुशबू इत्र महक बेचने के लिये एक दुकान जो गुलाब गन्धी के नाम से करीब सौ साल से मशहूर हैं , के सामने से गुजरे , दुकान में सजी खूबसूरत शीशियों में भरे रंग बिरंगे द्रव्य , और उनसे आकर्षित होकर ज़रा से करीब जाते ही , मादक खुशबू , वाह क्या बात थी ।

मैने डैडी से पूछा यह कैसी दुकान हैं , डैडी ने जवाब दिया बहुत ही ख़ास दुकान हैं , आओ देखे , डैडी ने दुकानदार से कहा की मिट्टी का इत्र को सुंघाईये , दुकानदार ने एक शीशी से एक हल्की बूँद मेरे हाथ पर लगाई , मैने जब सूँघा तो अवाक रह गया , मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू , जैसे पहली बारिश के बाद पल दो पल के लिये आती है , जैसे नये नये मिट्टी के घड़े के पहले दो तीन दिन पानी पीने में आती हैं , यह मिट्टी का इत्र कैसे बनाया ? यह अनुभव शब्दों में कैसे बयान करूँ ?

गुलज़ार साहिब के शब्दों में :
सिर्फ़ अहसास हैं यह रुह से महसूस करो ...

डैडी ने दो किस्म इत्र खरीदे , पहली मिट्टी और दूसरी गुलाब
वापसी के रास्ते में डैडी ने बताया ,

गुलाब का इत्र , हज़ारो फूलों को मसल कर एक बूँद इत्र बनता हैं , इस ही तरह एक अनुभवी व्यक्ति अपने अनेक अनुभव की सफलता असफलता से अर्जित ज्ञान को कभी बताये लिखे, तो सुनो , पढो , परखों ।

मिट्टी का इत्र , एक हुनर को दर्शाता है , अनेकानेक प्रयोगों के बाद तय हुई एक विधि , यानी पल दो पल के लिये आती खुशबू को एक तरल बनाकर एक शीशी में बंद करने की विधि ।

कोई भी हुनर, औरों से श्रेष्ठ हो तो उचित व्यापारिक लाभ से धन कमाने का आधार , जैसे यही इत्र की दुकान , इस तरह की बीसियों इत्र बेचने की दुकानों में इनके पास सर्वश्रेष्ठ हुनर हैं ।
आज यह बात हुऐ पैंतीस चालीस साल हुऐ होंगें , बीते कल की बात लगती हैं , आज भी किसी भीड़ में अकेले हुऐ तो अगले ही पल अपना बेचैन हाथ डैडी के मजबूत हाथों में थामे पाया ।

Kapil Jain with Kamini Jain
Noida, Uttar Pradesh, INDIA
March 15th, 2020
All rights reserved

Monday, February 10, 2020

Ulhane Ke Laddoo : Story By Kapil Jain

उल्हाने के लड़डू : Story by Kapil Jain

मम्मी जी का स्वर्गवास हुऐ आज आठ साल हुऐ , उन्ही के शब्दों में कहूँ तो अगर अतीत याद आये तो ख़ुशगवार पल याद करो , अतः उन्हें श्रदांजली स्वरूप , हमारी खूबसूरत ज़िन्दगी का उत्सव , छोटी छोटी बातो में,

मेरी उम्र कोई दस गयारह साल रही होगी , एक शाम जब खेल कूद कर घर पहुँचा तो खाने के मेज़ पर एक लड़डू से भरे डब्बे को देख खुश हो गया , झट से एक लड्डू खाया , जैसे ही और खाने के लिये हाथ बढ़ाया , मम्मी ने रसोई से कहा , अब पहले खाना खा लो

लड़डू बहुत ही मजेदार था, यह कहाँ से आये ? घर पर बनाये लगते हैं ? , हलवाई वाला स्वाद नही हैं ? मैंने पूछा 

हाँ सही हैं , कँचन और कविता की माँ सविता बहनजी ने अपने हाथों से बना कर यह लड़डू भेजे हैं, सिर्फ़ हमे ही नही, सारे मोहल्ले भर को बड़े प्यार से भेजे हैं , बात हमारे साथ के मकान के परिवार की थी, 

मैने पूछा क्यूँ ? क्या खुशी हैं तो मम्मी ने हँसते हुऐ बताया की कंचन और कविता के चार साल के भाई यानी आकाश ने आज गली में एक और पड़ोसी जिन्हें हम विम्मी आंटी कहते थे , के घर कोई छोटी मोटी शैतानी कर दी थी, इसकी शिकायत विम्मी आंटी ने आकाश की माँ से कर दी, इस शिकायत यानी उल्हाने से खुश होकर उन्होंने यह लड्ड़ू भेजे हैं

मैने पूछा यह अजीब बात हुई ? कुछ बात समझ नही आयी , यानी आकाश के शरारत से उपजी शिकायत में खुशी में लड़डू बाटने की क्या वजह हो सकती हैं ?

मम्मी जी ने बताया की सविता बहनजी, आकाश के बहुत देर से चलने बोलने और बचपन की कम गतिविधियों की वजह से हमेशा से बहुत ही चिंतित रहती थी , मैंने हमेशा उन्हें कहा था की आकाश बिलकुल ठीक हैं , कितना खूबसूरत हँसता खेलता बच्चा हैं , कोई कोई बच्चा थोड़ी ज्यादा समय से चलते बोलते हैं , असल समस्या सविता बहनजी की थी आकाश की नही , कंचन और कविता से बारह साल छोटे आकाश का कमजोर पैदा होना , इस बारह साल के बीच में दो और बच्चे हुऐ और छः छः महीने भी जीवित नही रहे , बहुत ही मानसिक वेदना से गुजरी थीं  

आज जब आकाश अपनी शैतानी का उल्हाना लाया तो उन्हें यकीन हो गया की सब बिल्कुल ठीक हैं , इस ही खुशी में लड्डू बटे हैं , शायद कोई मन्नत पूरी हुई हैं भगवान सबको हँसी खुशी दीर्घआयु दे

आज चालीस साल बीते , आकाश अब सिंगापुर में अपने परिवार के साथ रहता हैं और फेसबुक पर लगातार सम्पर्क में हैं

Kapil Jain with Kamini Jain
Kapilrishabh@gmail.com
February , 2020
Noida , U.P. India
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